प्रकृति का रखो मान

कैसी है ये विपदा, जिसकी है दुगुनी गति,

हर तरफ पानी से हो रही क्षति|

कारण किसी ने जाना नहीं, जिम्मेदार खुद को माना नहीं,

ना समझी हमसे बड़ी हुई, जो नाराज़ हमसे प्रकृति हुई|

 

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मित्र और मित्रता

जिससे हो एक अनोखा विशवास, जो रहे हमारे दिल के हमेशा आसपास,
मिले उससे एक भी दिवस, तो लगता है जैसे एक मास,
शख्स वो हमारा होता है जिसे कहते है मित्र ख़ास।

 

 

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महावीर जयंती

धर्म ये इतना सरल नहीं है, ख़ुशी से बीते जीवन सारा, इसमें जीने का ये हल नहीं है,

मोह माया से बचके रहते, सांसारिक बंधन इसकी पहल नहीं है|

अलग अलग युगो में शिक्षा देने, भिन्न भिन्न संस्थापक आये थे,

अहिंसा और अपरिग्रह का ज्ञान दे गए, २४वे संस्थापक महावीर कहलाये थे|

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बैसाखी

बैसाखी का दिन निराला, स्थापना के साथ साथ, सिखों को दिया सिंह नाम है,

मुण्डे पर जचता पगड़ी और धोती कुरता, पटियाला सूट कुडियो की पहचान है|

भांगरे से ताल मिलाकर जब जब ढोल नगाड़ा बजता है,

एक जुट होता जन-समूह ये सारा, रंग बिरंगा हिंदुस्ता मेरा सजता है|

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स्वस्थ रहे मस्त रहे

दिन चर्या जो चल रही आज की, गौर न कोई फ़रमा रहा,

कोई हँसे अपने फैट पर, कोई पतले होने पर शरमा रहा|

कोई खुद को परफेक्ट समझ रहा, कोई gym  जाने को  गरमा रहा,

लेकिन एक अच्छी प्रक्रिया को, कोई न अपना रहा|

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नवरात्री

साल में आते चार नवरात्री, किसको दे दू प्रथम स्थान,

चारो ही किसी न किसी रूप में, कर रहे जान-मानव कल्याण|

दो तो आये गुप्त रूप से, आषाढ़ और माध के महीने में,

चैत्र और आश्विन को हम पूजे, जैसे सजती अंगूठी हीरे के नगीने में|

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त्रिकालदर्शी शिव

shivratriशिव रात्रि के इस पर्व पर हम शिव के भक्त तो बन जाते है,

पर जितना त्याग किया शिव ने,

उसका थोड़ा ऋण भी चूकाते है|

विष का प्याला पी गए वो,

जन जन को माहुर से बचाने को,

पर हर ज़ीवा हलाहल उगल रही,

खुद की शैली दिखाने को|

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वीर शहीद

शत शत नमन लिख लिया सबने Facebook और whatsapp पर,

पर क्या कोई सोच रहा, हालत परिवार की उस सैनिक के घर पर|

राजनेता सबसे आगे वैसे तो चढ़ कर आते है,

फिर क्यों न खुद के महल से, अपने पुत्रो को देश की रक्षा में लगाते है|

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नेताजी सुभाष चंद्र बॉस

आज़ादी का था जो दीवाना, सुभाष चंद्र जी नाम है,

आज इनकी जयंती पर, इन्हे शत-शत प्रणाम है|

सबकी कोशिशों को नाकाम किया था,

अंग्रेजो को सरेआम किया था,

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चुनाव


 चुनाव चुनाव सब करे, मतलब समझे ना कोई,

सरकार किसी की भी बने, घाटा तो जनता को होइ |

वादे करके उन्नति के, जनता को उल्लू पटाते है,

चाँद की बाते करते रहते, बादल तक छू ना पाते है,

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