आत्मसम्मान(Self esteem)

सफलता हासिल हो जाती है, कुछ मेहनत और थोड़ी नालाकियो से, कौन शख्स इसका गुरूर दिखाता है,

कुर्सी पर तो हर इंसान बैठा है, पर कौन Chair-E-Post  का सुरूर दिखाता है|

हम भरोसा खुद पर करते है, चुगलबाज़ो पर नहीं,

हम व्यवहार दिल से निभाते है, आड़ लेते कागज़ो पर नहीं,

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पंछी

कहते है पंछी हर ईमारत पर बैठता है,

  कोई नहीं समझता वो किस अशून्य में देखता है,

कभी गौर फरमाइएगा हुज़ूर ,

  वो ईमारत के अंदर की कहानी अमुक शब्दों में बोलता है।

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पुराना साल गया नहीं…..नया साल आ गया…….

पुराना साल गया नहीं…..नया साल आ गया…….

जो चला गया वो दे गया सपने,

जो चला गया वो दे गया यादें,

कैसे भूले दिन वो दुःख के, कैसे जिए दोबारा दिन वो सुख के,

जो चला गया वो दे गया हज़ारों बातें|

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मन

आज मन इतना क्यों अशांत हो रहा,

क्या है वो विचार जो इसमें बह रहा ,

शुन्य हल वाली समीकरण है शायद,

जिसके संयोग में अनगिनत संचार हो रहा । 

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चुनाव


 चुनाव चुनाव सब करे, मतलब समझे ना कोई,

सरकार किसी की भी बने, घाटा तो जनता को होइ |

वादे करके उन्नति के, जनता को उल्लू पटाते है,

चाँद की बाते करते रहते, बादल तक छू ना पाते है,

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अद्द्भूत काया रूप , गणेश बुद्धि सुरूप ||

कहते है तीसरी शक्ति जो दिखाई नहीं देती, जो सुनाई नहीं देती,
बस महसूस होती है, आस्था में, भक्ति में, जो सदैव आपके साथ चलती है
मन की आवाज़ बन कर आपको सही मार्ग दिखती है, 
उसे भगवान कहते है   |
भगवान ही एक मात्र हमारे हर सुख दुःख का, हर काम का साथी है|
 उन भगवान् ने खुद को पात्र बनाकर जो भी लीला रची है, 
वो मानव जाती को एक सन्देश देती है|
हज़ारो लीलाओ में से एक लीला जिससे हमे ये समझ आता है,
की सभी मानव एक अद्भुत जीव है , जिसका उसके रूप से, रंग से, चेहरे से या दौलत से मापदंड नहीं किया जा सकता|

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कृष्ण और राधा का प्रेम जग में सबसे मशहूर है, आज के युग में ऐसा प्रेम कोई नहीं जानता।

“निस्चल प्रेम स्वरुप,
               कृष्ण-राधा रूप ”

चल – कपट – ईष्र्या, मोह – माया का संगम होता है,
आत्मा की शुद्धि का पता नहीं, बस लिपस्टिक से सजी काया का मनन होता है।
एक है राधा जिसने प्रेम को सब कुछ माना है,
फेरो के बंधन बंधी नहीं, फिर भी कृष्ण को अपना माना है,

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