प्रकृति का रखो मान

कैसी है ये विपदा, जिसकी है दुगुनी गति,

हर तरफ पानी से हो रही क्षति|

कारण किसी ने जाना नहीं, जिम्मेदार खुद को माना नहीं,

ना समझी हमसे बड़ी हुई, जो नाराज़ हमसे प्रकृति हुई|

 

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पंछी

कहते है पंछी हर ईमारत पर बैठता है,

  कोई नहीं समझता वो किस अशून्य में देखता है,

कभी गौर फरमाइएगा हुज़ूर ,

  वो ईमारत के अंदर की कहानी अमुक शब्दों में बोलता है।

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