मन

आज मन इतना क्यों अशांत हो रहा,

क्या है वो विचार जो इसमें बह रहा ,

शुन्य हल वाली समीकरण है शायद,

जिसके संयोग में अनगिनत संचार हो रहा । 

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लड़की ———- बहु या बेटी ?

आज ज़ेहन में फिर से एक सवाल उठा है,

प्रश्न बड़ा ही कॉमन है, पर  सोचने का नजरिया जुदा है|

“एक घर में दो लड़किया, जो साथ साथ तो रहती थी,

पहली घर के मालिक की बेटी, दूसरी बहु रुपी समुद्र में बहती थी |

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नारी व्यथा

प्रेम तुम्ही  से  किया  है  हमने , तुम संग प्रीत लगाई है,

पर क्या हश्र होता जीवन का, तुमने ये सीख सिखलाई है|

माटी का पुतला बन कर रही तो मैं एक प्यारी नारी थी,

माँगा थोड़ा स्नेह जो तुमसे, तो मैं पढ़ी लिखी गंवार नारी थी|

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अद्भुत

अद्भुत है ये बचपन, अद्भुत बचपन की पढाई है,
जब से हाथ में कलम उठाई, दुनिया समझ में आयी है।
मैं छोटा नन्हा सा बालक, कितना बोझ उठाता हु,
दादा दादी का हाथ पकड़, उन्हें बचपन की सैर करता हु।

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जीवन का आधार: रिश्ता/ दौलत

  पैसा ही सब कुछ………

कहते है आज के युग में हर व्यक्ति को पढ़ना चाहिए, ताकि वो अपने भविष्य में किसी और पर निर्भर न रहे| शिक्षा के चलते लड़के और लड़की का कमाने जाने वाला भेद भी ख़त्म हो गया है |

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श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी

शख्स वो आम नहीं था

शख्स वो आम नहीं था, झूट कपट का काम नहीं था,

गरजे जैसे दहाड़ शेर की, डर शब्द का नाम नहीं था,
देकर आंसू चला गया, कोई उसके समान नहीं था,
शख्स वो आम नहीं था।
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