मोहब्बत – राहत या आफत

ज़ज़्बातो से इकरार किया था,

झुकी नज़रो से स्वीकार किया था,

कोई यन्त्र नहीं बना मापने के लिए,

इतना तुमसे प्यार किया था |

 

कहते है ग्रहण सभी को लगता है.

चाहे सूरज हो या चाँद,

हम भी कैसे बच पाते,

है तो आखिर मामूली एक इंसान |

गीली आँखों से उस अंधियारे को भी स्वीकार किया था,

दुनिया पागल कहती थी हमको, उस हद तक तुमसे प्यार किया था |

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नहीं वो साल भी बुरा नहीं था

हम सब ने नव वर्ष की फिर से खुशियां मनाई थी,

ख़त्म हो गया २०२०, इक दूजे को दी बधाई थी,

सार्वजनिक वाक्य था, बुरा साल अब चला गया,

पर क्यों ऐसा महसूस हो रहा है, वो साल भी बुरा नहीं थ।

 

भागती ज़िन्दगी में एक विराम लगाया,

चार पहर में से तीन पहर आराम दिलाया,

सुकून के जिन पलो की चाहत थी सपनो में,

जागती आँखों से उन्हें सच कर दिखाया,

इसलिए महसूस हो रहा है, वो साल भी बुरा नहीं था।

नन्हे मासूमो को भारी बोझ  से बचा लिया,

बुज़ुर्गो को घर में ही स्वर्ग दिखा दिया,

बड़ो को चैन से मुखातिब करा दिया,

इसलिए महसूस हो रहा है, वो साल भी बुरा नहीं था।

 

हम सब कोरोना को झेल रहे थे,

लेकिन फिर भी साथ में सब के खेल रहे थे,

खुशियों का माहौल बना था,

पकवानो का मेला लगा था,

अलग होकर भी सब एक लग रहे थे,

इसलिए महसूस हो रहा है, वो साल भी बुरा नहीं था।

 

सोचो प्रकृति खुश थी कितनी,

चोरी, डकैती भी बंद थी, अस्मत बहनो की बची हुई थी,

आतंक का नाम नहीं था, बुरे वक़्त में भी अपनों की एकता से जीती लड़ाई थी,

इसलिए महसूस हो रहा है, वो साल भी बुरा नहीं था।

 

Dr. Sonal Sharma

मैं खुद में ज़िन्दा नहीं

देख तमाशा दुनिया का, सुनके ताने अपनों के,

रोंध के खुद की खुशियों को, तोड़ के तारे सपनो के,

जी तो रही हूँ, पर शायद मैं खुद में ज़िन्दा नहीं।

 

 

सोच के सबके बारे में , मैंने खुद की मुस्कुराहट ही खोदी,

नहीं संभल रहे थे रिश्ते पुराने, नए की बुनियाद क्यों बोदी ?

पूँछ सवाल स्वयं से, मैं अपने में ही रो लेती हूँ,

जी तो रही हूँ, पर शायद मैं खुद में ज़िन्दा नहीं।

 

आँखों से आँसू न छलक रहे, ना ही रही लब पर मुस्कान,

दिल में दर्द की गिनती इतनी, जितने फलक में नक्षत्र (गिनती) समान,

टूटे शब्दों की माला,मैं स्वरुप में ही पिरो लेती हूँ,

जी तो रही हूँ, पर शायद मैं खुद में ज़िन्दा नहीं।

 

आत्म-सम्मान को मेरे, नाम दिया गया अभिवृत्ति,

विश्वास को अहंकार बता कर, क्षति कर दी मेरी मति,

बंधन – प्यार जैसे शब्दों से, आत्मा को आशा की गोली दे देती हूँ,

जी तो रही हूँ, पर शायद मैं खुद में ज़िन्दा नहीं।

 

डॉ सोनल शर्मा

दर्द

दर्द भी आज रोने लगा, जब दिल के दर्द को दर्द हुआ,

हम दर्द में जी रहे थे ज़िंदगी हमारी, पर अब दर्द भी बेदर्द हुआ।

हंसी के परदे लगा दिए लबों पर, की आह कही निकल ना जाये,

रोशनी के परदे लगा दिए आँखों पर, की आंसू कही छलक ना जाये,

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प्रकृति का रखो मान

कैसी है ये विपदा, जिसकी है दुगुनी गति,

हर तरफ पानी से हो रही क्षति|

कारण किसी ने जाना नहीं, जिम्मेदार खुद को माना नहीं,

ना समझी हमसे बड़ी हुई, जो नाराज़ हमसे प्रकृति हुई|

 

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आत्मसम्मान(Self esteem)

सफलता हासिल हो जाती है, कुछ मेहनत और थोड़ी नालाकियो से, कौन शख्स इसका गुरूर दिखाता है,

कुर्सी पर तो हर इंसान बैठा है, पर कौन Chair-E-Post  का सुरूर दिखाता है|

हम भरोसा खुद पर करते है, चुगलबाज़ो पर नहीं,

हम व्यवहार दिल से निभाते है, आड़ लेते कागज़ो पर नहीं,

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मित्र और मित्रता

जिससे हो एक अनोखा विशवास, जो रहे हमारे दिल के हमेशा आसपास,
मिले उससे एक भी दिवस, तो लगता है जैसे एक मास,
शख्स वो हमारा होता है जिसे कहते है मित्र ख़ास।

 

 

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दिल का हाल

दिल का आशियाना भी बहुत ही कमाल है,
कुछ अपने है, कुछ बैगाने है, और सपनो का भी इसमें धमाल है,
इश्क़ किया तो पछता गए, किया तो ललचाते रहे,
वक़्त का नहीं, दिल का हाल बेहाल है।

 

 

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रिश्ता क्या कहलाता है

खुदा भी गजब करता है,,, जिन्दगी में नए रंग भरता है,,,,

समझ नहीं पाते हम आखिर यह रिश्ता क्या कहलाता है,,,

प्यार है,,,,इकरार है,,,,,समझ कर भी हर बात में नासमझी है,,,,

ठहर जाते है चलते चलते हम,, पर समझ नहीं पाए की यह रिश्ता क्या कहलाता है !!!!!!

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वक़्त

वक़्त, वक़्त की बात है, ये वक़्त बड़ा ही अनोखा है,
कभी तो है ये साथ तेरे, तो कभी ये देता धोखा है।
कहता है, ऐ खुदा के बन्दे, तू क्यों अकड़ दिखाता है,
जब जब छोड़े साथ ज़मीन का , चोट जिस्म पर खाता है।

 

 

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